(हिंदी भांषा ) उदभव, विकास और स्वरुप

नमस्कार दोस्तों स्वागत  है आपका हमारे हिंदी साहित्य ब्लॉग पर दोस्तों इस पोस्ट में हम हिंदी भांषा : का 
 उदभव, विकास और स्वरुप  के बारे में विस्तार से समझेंगे।
एक बात तो है हम सभी के मन में यह विचार  आता है कि कोई ऐसी ट्रिक हो कि हमें ज्यादा पढ़ना न पड़े और हमारा पेपर भी निकल जाये तो आपको बता दें, जितना ज्यादा आप शॉर्टकट जाने का प्रयास करेंगे उतना ही ज्यादा आपका नुकसान  हो जायेगा शार्ट में जाने से आप बहुत कुछ खो भी देते हैं और आपको मालूम भी नहीं पड़ता इसलिए मैं आपसे यही आग्रह करता हूँ कि आप कम पढ़ें  किसी भी विषय पर , लेकिन उस विषय के बारे में  पूर्ण जानकारी अवश्य प्राप्त करें।  


हिंदी भांषा : उदभव, विकास और स्वरुप 

हिंदी जिस भाषा-धारा के विशिष्ट दैनिक और कलिक रूप का नाम है, भारत में उसका प्राचीनतम रूप संस्कृत है। संस्कृत का काल मोटे रूप से 1500 ई० पू०  से 500 ई० पू० तक माना जाता है। इस काल में संस्कृत बोलचाल की भाषा थी। उस बोलचाल की भाषा का ही शिष्ट और मानक रूप संस्कृत वाङ्मय  में प्रयुक्त हुआ है। संस्कृत भाषा के भी दो रूप मिलते हैं, एक भाषा वैदिक संस्कृत है, जिसमें वैदिक वाङ्मय की रचना हुई है और दूसरी लौकिक या क्लासिकल  संस्कृत है, जिसमें वाल्मीकि, व्यास, भास, अश्वघोष, कालिदास, माघ आदि  की रचनाएं हैं। इस संस्कृत-काल के अंत तक मानक या परिनिष्ठित भाषा तो एक थी, किंतु तीन क्षेत्रीय बोलियों विकसित हो चली थीं, जिन्हें पश्चिमोत्तरी, मध्यदेशी  तथा पूर्वी नाम से अभिहित किया जा सकता है।
      
       संस्कृतकालीन बोलचाल की भाषा विकसित होते-होते 500 ई० पू० के बाद प्रवृत्तितः  काफी बदल गई, जिसे ʻ पाली ʼ की संज्ञा दी गई है। इसका काल 500 ई० पू०से पहली ईसवी  तक है। बौद्ध ग्रंथों में पाली का जो रूप मिलता है वह इस बोलचाल की भाषा का ही शिष्ट और मानक रूप था।  इस काल में क्षेत्रीय बोलियों की संख्या चार हो गई थी : पश्चिमोत्तरी, मध्यदेशी, पूर्वी और दक्षिणी।
        पहली ईसवी तक आते-आते यह बोलचाल की भाषा और परिवर्तित हुई तथा पहली ई० से 500 ई०  तक का इसका रूप ʻप्राकृतʼ  नाम से अभिहित किया गया। इस काल में क्षेत्रीय बोलियां कई थीं, जिसमें मुख्य शौरसेनी, पैशाची, व्राचड़, महाराष्ट्री, मागधी और अर्धमागधी प्रमुख थीं। 
प्राकृतों से ही विभिन्न  क्षेत्रीय अपभ्रंशों का विकास हुआ। अपभ्रंश  भाषा का काल मोटे रूप से 500 ई०  से 1000 ई० तक है। आज के प्राप्त अपभ्रंश साहित्य में मुख्यतः पश्चिमी और पूर्वी दो ही भाषा रूप मिलते हैं, किंतु प्राकृत के मुख्यतः पांच क्षेत्रीय रूपों  तथा आज की नौ ( लहंदा, पंजाबी, सिंधी, गुजराती, मराठी, हिंदी, उड़िया, बांग्ला, असमिया) आर्यभाषाओं के बीच की अपभ्रंश  रूप में प्राप्त कड़ी के क्षेत्रीय रूपों की संख्या छह और दस  के बीच में ही होगी; इससे कम नहीं हो सकती।  इससे यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि अपभ्रंश के सभी क्षेत्रीय रूपों का अपभ्रंश साहित्य में प्रयोग नहीं हुआ। यदि  विभिन्न प्राकृतों से विकसित अपभ्रंश को किसी अन्य नाम के अभाव में प्राकृत नामों से ही अभिहित करें तो आधुनिक आर्यभाषाओं का जन्म अपभ्रंश के विभिन्न   क्षेत्रीय रूपों से इस प्रकार  माना जा सकता है  :


  अपभ्रंश         आधुनिक भाषाएं तथा उपभाषाएं   शौरसेनी      पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, पहाड़ी, गुजराती
 पैशाची        लहंदा, पंजाबी 
   व्राचड़                  सिंधी  
  महाराष्ट्री                   मराठी
  मागधी               बिहारी, बांग्ला, उड़िया, असमिया 
  अर्धमागधी                 पूर्वी हिंदी 
    
       उपयुक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि हिंदी भाषा का उद्द्भव अपभ्रंश के शौरसेनी, अर्धमागधी और मागधी रूपों से हुआ है। 
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आपने अपना  अमूल्य समय दिया मेरी पोस्ट पर जिसके लिए आपका  ह्रदय से धन्यवाद 




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