उपभाषाएँ तथा बोलियाँ
हेलो फ्रेंड्स स्वागत है आपका हमारे हिंदी साहित्य ब्लॉक पर इस पोस्ट में हम जानने वाले हैं भाषा, उपभाषाएं तथा बोलियां दोस्तों पूर्ण जानकारी के लिए आप हमारा पूरा पोस्ट जरूर पढ़ें।
हिंदी प्रदेश, उपभाषाएँ तथा बोलियाँ
हिंदी भाषा का क्षेत्र हिमाचल प्रदेश, पंजाब भाग, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली,उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, मध्यप्रदेश तथा बिहार है, हिंदी (भाषा) प्रदेश कहते हैं। इस पूरे क्षेत्र में हिंदी की पांच उपभाषाएं हैं, जनके अंतर्गत मुख्यतः 10 बोलियां हैं
भाषा उपभाषाएं बोलियां
भाषा उपभाषाएं बोलियां
हिंदी 1. पश्चिमी हिंदी 1. खड़ी बोली या कौरवी
2. ब्रजभाषा 3. हरियाणवी
4. बुंदेली 5. कन्नौजी
2. पूर्वी हिंदी 1. अवधी 2. बघेली
3. छत्तीसगढ़ी
3. राजस्थानी 1. पश्चिमी राजस्थानी
(मारवाड़ी),
2. पूर्वी राजस्थानी (जयपुरी),
3. उत्तरी राजस्थानी (मेवाती),
4. दक्षिणी राजस्थानी (मालवी)
4. पहाड़ी 1. पश्चिमी पहाड़ी
2. मध्यवर्ती पहाड़ी
(कुमाऊनी-गढ़वाली)
5. बिहारी 1. भोजपुरी, 2. मगही,
3. मैथिली
2. ब्रजभाषा 3. हरियाणवी
4. बुंदेली 5. कन्नौजी
2. पूर्वी हिंदी 1. अवधी 2. बघेली
3. छत्तीसगढ़ी
3. राजस्थानी 1. पश्चिमी राजस्थानी
(मारवाड़ी),
2. पूर्वी राजस्थानी (जयपुरी),
3. उत्तरी राजस्थानी (मेवाती),
4. दक्षिणी राजस्थानी (मालवी)
4. पहाड़ी 1. पश्चिमी पहाड़ी
2. मध्यवर्ती पहाड़ी
(कुमाऊनी-गढ़वाली)
5. बिहारी 1. भोजपुरी, 2. मगही,
3. मैथिली
खड़ी बोली : खड़ी बोली शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है। एक तो साहित्यिक हिंदी खड़ी बोली के अर्थ में और दूसरे हिंदी मेरठ के आसपास के लोग बोली के अर्थ में जहां दूसरे अर्थ में ही इस शब्द का प्रयोग किया जा रहा है। इसी अर्थ में कौरवी का भी प्रयोग कुछ लोग करते हैं। खड़ी बोली में खड़ी शब्द का अर्थ विवादास्पद है। कुछ लोगों ने खड़ी का अर्थ खरी पूर्व अर्थात शुद्ध माना है। दूसरों ने खड़ी (Standing)कुछ अन्य लोगों ने इसका संबंध खड़ी बोली में अधिकता से प्रयुक्त खड़ी बोली पाई तथा उसके धनात्मक प्रभाव करता से जुड़ा है। अभी तक यह प्रश्न अनिश्चित है। खड़ी बोलियां कौरवी का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश रूप से हुआ है। तथा इसका क्षेत्र देहरादून का मैदान भाग सहारनपुर मुजफ्फरनगर मेरठ दिल्ली का कुछ भाग बिजनौर रामपुर तथा मुरादाबाद लोक साहित्य की हिंदी से खड़ी बोली बहुत संपन्न है और इसमें पवाड़ा नाटक लोक कथा लोक गीत आज पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। इनका काफी अंश प्रकाशित भी हो चुका है। हिंदी उर्दू हिंदुस्तानी तथा दक्षिणी एक सीमा तक खड़ी बोली पर आधारित है।
ब्रजभाषा : बृज का पुराना अर्थ पशु या गांव का समूह या चरागाह आदि पशुपालन के प्राधान्य के कारण यह क्षेत्र ब्रिज कहलाया और उसी आधार पर इसकी बोली ब्रजभाषा कहलाए इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश के मध्यवर्ती रूप से हुआ है ब्रजभाषा आगरा मथुरा अलीगढ़ धौलपुर मैनपुरी एटा बदायूं बरेली तथा आसपास के क्षेत्रों में बोली जाती है साहित्य और लोक साहित्य दोनों ही दृष्टि से ब्रजभाषा बहुत संपन्न है हिंदी प्रदेश के बाहरभी भारत के अनेक क्षेत्रों में ब्रज भाषा में साहित्य रचना होती रही है सूरदास तुलसीदास नंद दस रहीम रसखान बिहारी देव रत्नाकर आदि इसके प्रमुख कवि हैं।
हरियाणा शब्द की व्युत्पत्ति विवादास्पद है याद करते ही द्वारिका गया था तथा अहीर प्लस आना (राजपूताना तेलंगाना की तरह) आदि कई मत किए गए हैं किंतु कोई सर्वमान्य नहीं है हरियाणवी का विकास उत्तरी और सैनी अपभ्रंश के पत्नी रूप से हुआ है खड़ी बोली अहिरवादी मारवाड़ी पंजाबी से इस बोली को कुछ लोग खड़ी बोली का पंजाबी से प्रभावित रूप मानते हैं इसका छोटे रूप से हरियाणा तथा दिल्ली का देहाती भाग है हरियाणवी में केवल लोक साहित्य है जिसका कुछ अंश भी है।
बुंदेली: बुंदेली राजपूतों के कारण मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश की सीमा रेखा के झांकी छतरपुर सागर आदि तथा आसपास के भाग को बुंदेलखंड कहते हैं वहीं बुंदेली बुंदेलखंडी है इसका क्षेत्र झांसी जालौन हमीरपुर ग्वालियर ओरछा सागर नरसिंहपुर होशंगाबाद तथा आसपास का क्षेत्र है बुंदेली का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है बुंदेली में लोक साहित्य काफी जिसमें स्थित है कहा जाता है कि हिंदी प्रदेश की प्रसिद्ध लोक गाथा आल्हा जिसे हिंदी साहित्य में भी स्थान मिला है, मूलता बुंदेली की एक उप गोली बना फरी में लिखी गई थी।
कन्नौजी: कन्नौज (संस्कृत कान्यकुब्ज) इस बोली का केंद्र है, अतः इसका नाम कन्नौजी पड़ा है। यह इटावा, फर्रुखाबाद, शाहजहांपुर, कानपुर, हरदोई, पीलीभीत आदि में बोली जाती है। कन्नौजी भी शौरसेनी अपभ्रंश से ही निकली है। यह ब्रजभाषा से इतनी अधिक सामान है कि कुछ लोग इसे ब्रजभाषा की ही एक उपबोली मानते हैं।कन्नौजी में केवल लोकसाहित्य मिलता है, जिसमें से कुछ अंश प्रकाशित भी हो चुका है।
अवधी : इस बोली का केंद्र अयोध्या है।`अयोध्या`का ही विकसित रूप अवध है, जिससे अवधि शब्द बना है। इसकी उद्भव के संबंध में विवाद है अधिकांश विद्वान इसका संबंध अर्धमगधी अपभ्रंश से मानते हैं किंतु कुछ लोग इससे पालक समानता के आधार पर इस मत को नहीं मानते अवधि का क्षेत्र लखनऊ, इलाहाबाद, फतेहपुर, मिर्जापुर (अंश्तः)उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर, फैजाबाद, गोंडा, बस्ती, बहराइच, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, बाराबंकी, आदि है। अवधी में साहित्य तथा लोक साहित्य दोनों ही पर्याप्त मात्रा में हैं। इसके प्रसिद्ध कवि मुरला दाऊद, कुतुबाम, जायसी, तुलसीदास, उस्मान, सबलसिंह आदि है।
बघेली : बघेल राजपूतों के आधार पर रीवा तथा आसपास का इलाका बघेलखंड कहलाता है और वहां की बोली को बघेलखंडी या बघेली कहते हैं बघेली का उद्भव अर्धमागधी अपभ्रंश के ही एक क्षेत्रीय रूप से हुआ है यद्यपि जनमत इसे अलग बोली मानता है किंतु भाषावैज्ञानिक स्तर पर यह अवधी की ही एक उपबोली ज्ञात होती है और इसे दक्षिणी अवधी कह सकते हैं ।इसका क्षेत्र रीवा, नागौद, शहडोल, सतना, महर तथा आसपास के क्षेत्र है। कुछ अपवादों को छोड़कर बघेली में केवल लोकसाहित्य है।
छत्तीसगढ़ी: छत्तीसगढ़ होने के कारण इसका नाम छत्तीसगढ़ी पड़ा है अर्धमगधी अप्रत्यक्ष रूप से इसका विकास हुआ है इसका क्षेत्र सरगुजा कोरिया बिलासपुर रायगढ़ खैरागढ़ रायपुर दुर्ग नंदगांव कांकेर आधी है छत्तीसगढ़ी में भी लोक साहित्य है।
पश्चिमी राजस्थानी: राजस्थानी कारू पश्चिमी राजस्थान अर्थात जोधपुर अजमेर किशनगढ़ मेवाड़ सिरोही जैसलमेर बीकानेर आदमी बोला जाता है इसे मारवाड़ी भी कहते हैं और उसका विकास हुआ है। मारवाड़ी में तथा लोक साहित्य दोनों ही पर्याप्त मात्रा में है। मीरा के पद इसी भाषा में है।
उत्तरी राजस्थानी: उत्तरी राजस्थान में अलवर गांव भरतपुर तथा आसपास के इलाके मेवात के नाम पर इसे मेवाती भी कहते हैं।इसकी एक मिश्रित बोली अहीरवाटी है, जो गुड़गांव,दिल्ली तथा करनाल के पश्चिमी क्षेत्रों में बोली जाती है । इस पर हरिया डी का बहुत प्रभाव है । मेवाती में केवल लोकसाहित्य है।उ राजस्थानी का उद्भव शौरसेनि अपभ्रंश से हुआ है।
पूर्वी राजस्थानी : राजस्थान के पूर्वी भाग में जयपुर, अजमेर, किशनगढ़ आदि में यह बोली जाती है। इसकी प्रतिनिधि बोली जयपुरी है, इसका केंद्र जयपुर है। जयपुरी को ढूंढाड़ी भी कहते हैं, क्योंकि इस क्षेत्र का नाम ढूंढााड़ है ।शौरसेनीी अपभ्रंश से विकसित इस बोली में केवल लोकसाहित्य है।
दक्षिणी राजस्थानी : इंदौर, उज्जैन, देवास, रतलाम, भोपाल, होशंगाबाद तथा इनके आसपास इसका क्षेत्र है। इसकी प्रतिनिधि बोली मालवी है। जिसका मुख्यय क्षेत्र मालवा है। शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित इस बोली में कुछ साहित्य तथा पर्याप्त लोक सहित्य है।
पूर्वी राजस्थानी : राजस्थान के पूर्वी भाग में जयपुर, अजमेर, किशनगढ़ आदि में यह बोली जाती है। इसकी प्रतिनिधि बोली जयपुरी है, इसका केंद्र जयपुर है। जयपुरी को ढूंढाड़ी भी कहते हैं, क्योंकि इस क्षेत्र का नाम ढूंढााड़ है ।शौरसेनीी अपभ्रंश से विकसित इस बोली में केवल लोकसाहित्य है।
दक्षिणी राजस्थानी : इंदौर, उज्जैन, देवास, रतलाम, भोपाल, होशंगाबाद तथा इनके आसपास इसका क्षेत्र है। इसकी प्रतिनिधि बोली मालवी है। जिसका मुख्यय क्षेत्र मालवा है। शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित इस बोली में कुछ साहित्य तथा पर्याप्त लोक सहित्य है।
पश्चिमी पहाड़ी : जौनसार, सिरमौर, शिमला, मंडी, चंबा तथा आसपास इसका क्षेत्र है। शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित इस बोली में केवल लोक सहित्य है।
मध्यवर्ती पहाड़ी : शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित इस बोली का क्षेत्र गढ़वाल, कुमाऊं तथा आसपास का क्षेत्र है। वस्तुतः या गढ़वाली और कुमाऊंनी इन दो बोलियों का ही सामूहिक नाम है। इन बोलियों में लोकसाहित्य तो पर्याप्त मात्रा में है, साथ ही कुछ साहित्य भी है।
भोजपुरी : बिहार के शाहाबाद जिले के भोजपुरी गांव के नाम से आधार पर इस बोली का नाम भोजपुरी पड़ा है। मागधी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से विकसित इस बोली का क्षेत्र बनारस, जौनपुर, मिर्जापुर, गाजीपुर, बलिया, गोरखपुर, देवरिया, आजमगढ़, बस्ती, शाहाबाद, चंपारन, सारण तथा आसपास का कुछ क्षेत्र है हिंदी प्रदेश की बोलियों में भोजपुरी बोलने वाले सबसे अधिक है भोजपुरी में मुख्यतः लोक साहित्य ही मिलता है, शिष्ट साहित्य बहुत कम है। भारतेंदु, प्रेमचंद, प्रसाद आदि इसी क्षेत्र के रहे हैं, किंतु साहित्य में इन्होंने इसका प्रयोग नहीं किया।
मगही : संस्कृत मगध से विकसित शब्द मगह पर इसका नाम आधारित है। मांगधी अपभ्रंश से विकसित यह बोली पटना, गया, पलामू, हजारीबाग, मुंगेर, भागलपुर तथा इसके आसपास बोली जाती है। इसमें लोक साहित्य काफी है। कुछ ललित साहित्य भी है।
मैथिली : मगधी अपभ्रंश के मध्यवर्ती रूप से विकसित यह बोली हिंदी और बांग्ला क्षेत्र की संधि पर मिथिला में बोली जाती है। दरभंगा, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया तथा मुंगेर आदि में इसका क्षेत्र है। लोक साहित्य की दृष्टि से मैथिली बहुत संपन्न है, साथ ही इसमें साहित्य रचना अत्यंत प्राचीन काल से होती चली आई है। हिंदी साहित्य को विद्यापति जैसे रससिद्ध देंने का ही है इसके अतिरिक्त गोविंददास, रणजीतलाल, हरिमोहन झा आदि भी इनके अच्छे साहित्यकार हैं।
आपका अपना अमूल्य समय देकर हमारा पोस्ट पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
उम्मीद करता हूं आपको हमारा पोस्ट पसंद आया होगा और भी हिंदी साहित्य से जुड़ी जानकारी पाने के लिए आप हमारे इस ब्लॉग से जुड़े रहें धन्यवाद।
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